शनिवार, ६ ऑक्टोबर, २०१८

बेवजहा

दिन-बदिन हम ऐसे यूँही मिलते हैं अब बेवजहा
वक्त, मंज़िल, ज़िंदगी - सब लगते हैं अब बेवजहा 

कोई रोशन कर गया है इस दिवाने मोड़ को 
चलते चलते हम अचानक रुकते हैं अब बेवजहा

सिर्फ़ नज़रोँसे कभी या दूरसे हसके कभी 
बात होती है बयां पर कहते हैं अब बेवजहा

मेरी अपनी हैं ये यादें, मेरा अपना है ये ग़म 
पर शरारत मिलके दोनों करते हैं अब बेवजहा

हर कदम हर पल यहाँ महसूस करके हम तुम्हें 
शायरी तनहाइयोंपर लिखते हैं अब बेवजहा 

- कुमार जावडेकर



कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत:

टिप्पणी पोस्ट करा