बुधवार, २१ नोव्हेंबर, २०१८

क़ाबिल ए ग़ौर

क़ाबिल ए ग़ौर हम न थे इतने
या शहर में सितम न थे इतने

सोचे-समझे था मैने प्यार किया
दिल में मेरे भरम न थे इतने

फिर कभी कैसे इश्क़ ये होता
पास मेरे जनम न थे इतने

ग़म से वाक़िफ़ हुए तो थे हम भी
पर वो सारे वहम न थे इतने

क़समें-वादे भी वो निभाते पर
मेरे उनपे रहम न थे इतने

- कुमार जावडेकर


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