क़ाबिल ए ग़ौर हम न थे इतने
या शहर में सितम न थे इतने
सोचे-समझे था मैने प्यार किया
दिल में मेरे भरम न थे इतने
फिर कभी कैसे इश्क़ ये होता
पास मेरे जनम न थे इतने
ग़म से वाक़िफ़ हुए तो थे हम भी
पर वो सारे वहम न थे इतने
क़समें-वादे भी वो निभाते पर
मेरे उनपे रहम न थे इतने
- कुमार जावडेकर
या शहर में सितम न थे इतने
सोचे-समझे था मैने प्यार किया
दिल में मेरे भरम न थे इतने
फिर कभी कैसे इश्क़ ये होता
पास मेरे जनम न थे इतने
ग़म से वाक़िफ़ हुए तो थे हम भी
पर वो सारे वहम न थे इतने
क़समें-वादे भी वो निभाते पर
मेरे उनपे रहम न थे इतने
- कुमार जावडेकर
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