हम से वो दूर दूर रहते है
पर हमेशा करीब लगते है
(उम्र अब वो पचास कहते है
फिर भी हम को पचीस लगते है)
कोशिशे जिंदगीने की लेकिन
वो न रोते है, सिर्फ हसते है
‘बात है वक्त वक्त की’ कहके
अपने ही वक्त पर वो चलते है
उनका गुस्सा है लाजवाब सही
और वो रोज उससे सजते है
उनका हसना है लाजवाब सही
और वो रोज उससे खिलते है
प्यार खुद से किया सदा हमने
फिर भी वो प्यार हमसे करते है
शाम के रंग या सहर के हो
सच तो ये है वो उनपे जचते है
- कुमार जावडेकर
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